उषा खन्ना
उषा खन्नाजन्म:07 अक्तूबर 1941
उषा खन्ना हिन्दी सिनेमा में एक भारतीय संगीत निर्देशिका रही हैं। वह कुछ चुनिंदा महिला संगीतकारों में से एक है और पुरुष प्रधान संगीत उद्योग में सबसे अधिक व्यावसायिक रूप से सफल संगीत निर्देशकों में से एक है। उन्होंने दिल देके देखो से संगीत निर्देशक के रूप में पदार्पण किया था।
प्रसिद्ध संगीत निर्देशिका गायिका उषा खन्ना के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎂जन्म:07 अक्तूबर 1941, ग्वालियर
पति: सावन कुमार टाक
माता-पिता: मनोहर खन्ना
इनाम: राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फ़िल्म संगीत निर्देशन
उषा खन्ना का जन्म 7 अक्टूबर 1941 में ग्वालियर में हुआ था उनके पिता, मनोहर खन्ना, एक गीतकार और गायक थे, जो तत्कालीन ग्वालियर राज्य में जल निर्माण विभाग में सहायक अधीक्षक के रूप में कार्यरत थे। 1946 में जब वे किसी काम के लिए बॉम्बे (अब मुंबई) आए तो उनकी मुलाकात जद्दनबाई से हुई जो हिंदी फिल्म अभिनेत्री नरगिस दत्त की मां थीं उनके अनुरोध पर उन्होंने जावेद नाम से हिंदी फिल्मों के लिए गजलें लिखना शुरू किया उन्हें हर महीने एक हजार रुपये वेतन मिलता था उनके पिता मनोहर खन्ना को ग्वालियर राज्य में 250 रुपये महीने सैलरी मिलती थी वहीं जद्दनबाई की नर्गिस आर्ट प्रोडक्शंस की फिल्म रोमियो जूलियट के लिए लिखी गई 3 गजलों के लिए जद्दनबाई ने उनके 800 रुपये
फ़िल्मों में संगीत की दुनिया इस कदर पुरुष प्रधान है कि 87 सालों में कुल 10 फीमेल संगीत निर्देशक भी नहीं हो सकी हैं. सरस्वती देवी, जद्दन बाई और ऊषा खन्ना के बाद लंबे समय तक पूर्ण विराम लगा रहा और अब भी स्नेहा खानवलकर जैसे नाम अपवाद की तरह ही मिलते हैं . कुछ ऐसा ही हाल फ़िल्म निर्देशन में भी दिखता है. महिलाओं को लेकर इतना भेदभाव क्यों? आज भी पुरुषों के बनिस्बत उन्हें तत्व प्रधान रोल और मेहनताना अक्सर कम ही मिलता है
ऊषा खन्ना भी इस भेदभाव का शिकार रहीं, वरना क्या वजह थी कि बेहद कर्णप्रिय संगीत देने के बाद वे इंडस्ट्री में तो बनी रहीं, पर उन्हें वह मुकाम न मिला जिसकी वे हक़दार थीं? आप कहेंगे, यह बड़ी आम सी लाइन है. हर किसी के लिए जो सफल नहीं हुआ उसके लिए यह कहा जाता है
जी नहीं. यह सत्य है. लता मंगेशकर, मुकेश, किशोर कुमार या आशा भोंसले जैसे गायकों ने उनके संगीत निर्देशन में बेहतरीन नगमे गाये हैं, पर ऊषा खन्ना को बड़े बैनर्स की फिल्में नहीं मिलीं और इसी के चलते उनकी सफलता दूसरों के मुक़ाबले कम नज़र आती है
ऊषा खन्ना का संगीतकार बनना इत्तेफ़ाक था. वे तो गायिका बनना चाहती थीं. उनके पिता के जोड़ीदार के बेटे इंदीवर ने उन्हें संगीत निर्देशक बनने की सलाह दी. बहुत कम लोग गीतकार जावेद-अनवर की जोड़ी को जानते होंगे. जावेद, ऊषा के पिता मनोहर खन्ना थे और अनवर इंदीवर के वालिद थे. फ़िल्मों के शौक ने मनोहर साहब से अच्छी ख़ासी नौकरी छुड़वा दी. वे तो ज़्यादा कामयाब न हुए, पर उनकी बिटिया, यानी ऊषा खन्ना ने ज़रूर सफलता देखी
एक दिन इंदीवर उन्हें फ़िल्म ‘दिल दे के देखो’ के निर्माता एस मुखर्जी के पास ले गए. ओपी नैयर से उन दिनों मुखर्जी साहब की अनबन चल रही थी. उन्होंने ऊषा खन्ना का ‘ओपी’ स्टाइल का म्यूज़िक सुना तो ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें काम दे दिया और उनकी गाड़ी चल पड़ी.
यह ऊषा खन्ना का असली संगीत नहीं कहा जा सकता. वह मेलोडी जिसके लिए वे जानी गयीं, अभी निकलकर आने को बाकी थी. और वह आई फ़िल्म, ‘आओ प्यार करें’(1960) के गानों में. लता जी का गया हुआ सोलो, ‘एक सुनहरी शाम थी, बहकी बहकी ज़िन्दगी…’ लोगों ने खूब पसंद किया
ऊषा खन्ना ने बड़ी ही सौम्य धुनें बनायीं. न कहीं अतिरेक था भावनाओं का, न कहीं इंस्ट्रूमेंट्स का. सब कुछ संयत, एकदम संयत. मिसाल के तौर पर ‘हम हिन्दुस्तानी’(1960) का देशभक्ति गीत ही सुनिए. न म्यूज़िक लाउड होता है, न मुकेश बिलकुल ऊंचे स्केल में गाते हैं. यह बात इसलिए कि अक्सर देशभक्ति के गानों में भावनाओं अतिरेक होता है. ऊषा खन्ना इससे बचती हैं और सुनने वालों को भी बचाती हैं
बात यह है कि ऊषा खन्ना का संगीत तारतम्यता का बोध लिए लफ़्ज़ों के ऊपर चलता है, अतिरंजना से बचते हुए और 50 से 60 के दशकों में आये पश्चिमी इंस्ट्रूमेंट्स का माधुर्य लिये बजता है. जानकारों के मुताबिक़ उनका सर्वश्रेठ गीत लताजी का गया हुआ, ‘मांझी मेरी क़िस्मत के ले चल’ है. पर यतीन्द्र मिश्र को दिए इंटरव्यू में लता मंगेशकर ‘एक सुनहरी शाम थी बहकी-बहकी ज़िन्दगी’ को मानती हैं.’ यह लता जी का सर्वश्रेष्ठ गाना तो नहीं कहा जा सकता पर ऊषा खन्ना की सर्वश्रेष्ठ कम्पोज़ीशन कही जा सकती है
अरबी शैली के संगीत में उन्हें ख़ासी सफलता मिली. मिसाल के तौर मोहम्मद रफ़ी का गया गाना, ‘ये तेरी सादगी ये तेरा बांकपन’ और ‘मैंने रखा है मुहब्बत तेरे अफ़साने का नाम’ लोगों ने खूब पसंद किये. वैसे कई बार उनके साथ ऐसा भी हुआ कि कई गाने तो बेहतरीन बने पर हिट नहीं हुए
1960 से लेकर 1970 वाले दौर में ऊषा खन्ना अपने उरूज़ पर थीं. यहां वे कल्याण जी-आनंद जी, जयदेव, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल और रॉबिन बनर्जी जैसों के साथ कदम ताल कर रहीं थीं. यह दुनिया और इसकी जद्दोजहद बड़े कमाल की है. आप उसी से दो-दो हाथ कर रहे होते हैं, जिसने आपको उंगली पकड़कर चलना सिखाया होता है. ऊषा खन्ना ने रॉबिन बनर्जी से गायन सीखा था और अब वो उनसे मुकाबिल हो रही थीं. तो दूसरी तरफ़ उनके म्यूजिक अरेंजर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल उनसे आगे निकल गए
पर उनका असली मुकाबला अभी होना बाकी था, पंचम जैसे धुरंधर बस छाने को ही थे और इसी आंधी में उनके कदम डगमगाए तो सही पर उन्होंने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी. इस दौर में भी ऊषा खन्ना ने अच्छे गाने कंपोज़ किये. मुकेश तो खैर उनके पसंदीदा गायक थे ही, पर उनके अलावा किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर से भी उन्होंने खूब गवाया. लता मंगेशकर के अलावा अब फ़िल्म इंडस्ट्री कुछ और गायकों को लाने की हिम्मत कर रही थी. इनमें एक नाम आता है सुमन कल्याणपुर का
बहुत से लोग दावा करते हैं कि अगर घेराबंदी न की गयी होती तो सुमन कल्याणपुर लता मंगेशकर की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी होतीं. उनके मुताबिक फ़िल्म इंडस्ट्री ने सुमन जी के साथ ही अन्याय नहीं किया, अपना भी नुकसान किया. जो भी है, यहां तक आते-आते लता जी के घोड़े की रास थोड़ी ढीली हुई तो हेमलता, अलका याग्निक और अनुराधा पौंडवाल जैसी गायिकाएं सामने आईं. पर सुमन कल्याणपुर और ऊषा खन्ना का साथ खूब चला. दोनों की जुगलबंदी ‘वो जिधर देख रहे हैं, हम उधर देख रहे हैं’ में नज़र आती है
ऊषा खन्ना ने प्रोडूसर-डायरेक्टर सावन कुमार से शादी की. सावन कुमार की पहली ही फ़िल्म ‘हवस’ (1974) का संगीत काफी हिट हुआ था. उसका एक गाना था ‘तेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद’ कई दिलजले आशिकों का आज भी सबसे पसंदीदा गीत है
इस दौर में भी जब गानों में से मेलोडी गायब होती जा रही थी, ऊषा जी उसका दामन थामे हुए चल रही थीं. ‘दादा’ (1978) का गाना ‘दिल के टुकड़े-टुकड़े मुस्कुरा के चल दिए ही देखिए. जैसा मधुर ऊषा जी का संगीत है वैसी ही मधुर आवाज़ येसुदास की है. इस फ़िल्म के संगीत ने उनके कदम दोबारा जमा दिए थे. उन्हें धड़ाधड़ कई फ़िल्में मिलीं. ‘साजन बिना सुहागन’, ‘भयानक’, ‘बिन फेरे हम तेरे’ फ़िल्मों का संगीत अच्छा चला. पर बात अब भी वही थी, बड़ी बैनर्स उन तक नहीं आ रहे थे.
1980 के आसपास उनकी शादी टूट गयी. विडंबना देखिये या मजबूरी, सावन कुमार ने ‘सौतन’ फ़िल्म का संगीत उन्हीं के ज़िम्मे किया. उन्होंने ने भी अच्छा संगीत दिया. उस फ़िल्म के लगभग सारे गाने हिट हुए थे.
इस दौर में अब ऊषा खन्ना पिछड़ती जा रही थीं. लोगों की पसंदें बदल गयी थीं. लफ़्ज़ों में गहराई नहीं बची थी, संगीत से मेलोडी तो लगभग ख़त्म ही गयी थी. ऊषा जी ने वापसी की भरपूर कोशिश की जो कामयाब नहीं हुई. बड़े बैनर्स नहीं थे, छोटे बजट की फ़िल्में अक्सर कम चलती और उनका संगीत उनसे से भी कम. धीरे-धीरे ऊषा खन्ना बिलकुल ही गायब हो गयीं. इसी समय उनके द्वारा विशाल भारद्वाज की धुन के इस्तेमाल को लेकर विवाद हुआ था.
एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनाएं
उषा खन्ना हिन्दी सिनेमा में एक भारतीय संगीत निर्देशिका रही हैं। वह कुछ चुनिंदा महिला संगीतकारों में से एक है और पुरुष प्रधान संगीत उद्योग में सबसे अधिक व्यावसायिक रूप से सफल संगीत निर्देशकों में से एक है। उन्होंने दिल देके देखो से संगीत निर्देशक के रूप में पदार्पण किया था।
प्रसिद्ध संगीत निर्देशिका गायिका उषा खन्ना के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎂जन्म:07 अक्तूबर 1941, ग्वालियर
पति: सावन कुमार टाक
माता-पिता: मनोहर खन्ना
इनाम: राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फ़िल्म संगीत निर्देशन
उषा खन्ना का जन्म 7 अक्टूबर 1941 में ग्वालियर में हुआ था उनके पिता, मनोहर खन्ना, एक गीतकार और गायक थे, जो तत्कालीन ग्वालियर राज्य में जल निर्माण विभाग में सहायक अधीक्षक के रूप में कार्यरत थे। 1946 में जब वे किसी काम के लिए बॉम्बे (अब मुंबई) आए तो उनकी मुलाकात जद्दनबाई से हुई जो हिंदी फिल्म अभिनेत्री नरगिस दत्त की मां थीं उनके अनुरोध पर उन्होंने जावेद नाम से हिंदी फिल्मों के लिए गजलें लिखना शुरू किया उन्हें हर महीने एक हजार रुपये वेतन मिलता था उनके पिता मनोहर खन्ना को ग्वालियर राज्य में 250 रुपये महीने सैलरी मिलती थी वहीं जद्दनबाई की नर्गिस आर्ट प्रोडक्शंस की फिल्म रोमियो जूलियट के लिए लिखी गई 3 गजलों के लिए जद्दनबाई ने उनके 800 रुपये
फ़िल्मों में संगीत की दुनिया इस कदर पुरुष प्रधान है कि 87 सालों में कुल 10 फीमेल संगीत निर्देशक भी नहीं हो सकी हैं. सरस्वती देवी, जद्दन बाई और ऊषा खन्ना के बाद लंबे समय तक पूर्ण विराम लगा रहा और अब भी स्नेहा खानवलकर जैसे नाम अपवाद की तरह ही मिलते हैं . कुछ ऐसा ही हाल फ़िल्म निर्देशन में भी दिखता है. महिलाओं को लेकर इतना भेदभाव क्यों? आज भी पुरुषों के बनिस्बत उन्हें तत्व प्रधान रोल और मेहनताना अक्सर कम ही मिलता है
ऊषा खन्ना भी इस भेदभाव का शिकार रहीं, वरना क्या वजह थी कि बेहद कर्णप्रिय संगीत देने के बाद वे इंडस्ट्री में तो बनी रहीं, पर उन्हें वह मुकाम न मिला जिसकी वे हक़दार थीं? आप कहेंगे, यह बड़ी आम सी लाइन है. हर किसी के लिए जो सफल नहीं हुआ उसके लिए यह कहा जाता है
जी नहीं. यह सत्य है. लता मंगेशकर, मुकेश, किशोर कुमार या आशा भोंसले जैसे गायकों ने उनके संगीत निर्देशन में बेहतरीन नगमे गाये हैं, पर ऊषा खन्ना को बड़े बैनर्स की फिल्में नहीं मिलीं और इसी के चलते उनकी सफलता दूसरों के मुक़ाबले कम नज़र आती है
ऊषा खन्ना का संगीतकार बनना इत्तेफ़ाक था. वे तो गायिका बनना चाहती थीं. उनके पिता के जोड़ीदार के बेटे इंदीवर ने उन्हें संगीत निर्देशक बनने की सलाह दी. बहुत कम लोग गीतकार जावेद-अनवर की जोड़ी को जानते होंगे. जावेद, ऊषा के पिता मनोहर खन्ना थे और अनवर इंदीवर के वालिद थे. फ़िल्मों के शौक ने मनोहर साहब से अच्छी ख़ासी नौकरी छुड़वा दी. वे तो ज़्यादा कामयाब न हुए, पर उनकी बिटिया, यानी ऊषा खन्ना ने ज़रूर सफलता देखी
एक दिन इंदीवर उन्हें फ़िल्म ‘दिल दे के देखो’ के निर्माता एस मुखर्जी के पास ले गए. ओपी नैयर से उन दिनों मुखर्जी साहब की अनबन चल रही थी. उन्होंने ऊषा खन्ना का ‘ओपी’ स्टाइल का म्यूज़िक सुना तो ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें काम दे दिया और उनकी गाड़ी चल पड़ी.
यह ऊषा खन्ना का असली संगीत नहीं कहा जा सकता. वह मेलोडी जिसके लिए वे जानी गयीं, अभी निकलकर आने को बाकी थी. और वह आई फ़िल्म, ‘आओ प्यार करें’(1960) के गानों में. लता जी का गया हुआ सोलो, ‘एक सुनहरी शाम थी, बहकी बहकी ज़िन्दगी…’ लोगों ने खूब पसंद किया
ऊषा खन्ना ने बड़ी ही सौम्य धुनें बनायीं. न कहीं अतिरेक था भावनाओं का, न कहीं इंस्ट्रूमेंट्स का. सब कुछ संयत, एकदम संयत. मिसाल के तौर पर ‘हम हिन्दुस्तानी’(1960) का देशभक्ति गीत ही सुनिए. न म्यूज़िक लाउड होता है, न मुकेश बिलकुल ऊंचे स्केल में गाते हैं. यह बात इसलिए कि अक्सर देशभक्ति के गानों में भावनाओं अतिरेक होता है. ऊषा खन्ना इससे बचती हैं और सुनने वालों को भी बचाती हैं
बात यह है कि ऊषा खन्ना का संगीत तारतम्यता का बोध लिए लफ़्ज़ों के ऊपर चलता है, अतिरंजना से बचते हुए और 50 से 60 के दशकों में आये पश्चिमी इंस्ट्रूमेंट्स का माधुर्य लिये बजता है. जानकारों के मुताबिक़ उनका सर्वश्रेठ गीत लताजी का गया हुआ, ‘मांझी मेरी क़िस्मत के ले चल’ है. पर यतीन्द्र मिश्र को दिए इंटरव्यू में लता मंगेशकर ‘एक सुनहरी शाम थी बहकी-बहकी ज़िन्दगी’ को मानती हैं.’ यह लता जी का सर्वश्रेष्ठ गाना तो नहीं कहा जा सकता पर ऊषा खन्ना की सर्वश्रेष्ठ कम्पोज़ीशन कही जा सकती है
अरबी शैली के संगीत में उन्हें ख़ासी सफलता मिली. मिसाल के तौर मोहम्मद रफ़ी का गया गाना, ‘ये तेरी सादगी ये तेरा बांकपन’ और ‘मैंने रखा है मुहब्बत तेरे अफ़साने का नाम’ लोगों ने खूब पसंद किये. वैसे कई बार उनके साथ ऐसा भी हुआ कि कई गाने तो बेहतरीन बने पर हिट नहीं हुए
1960 से लेकर 1970 वाले दौर में ऊषा खन्ना अपने उरूज़ पर थीं. यहां वे कल्याण जी-आनंद जी, जयदेव, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल और रॉबिन बनर्जी जैसों के साथ कदम ताल कर रहीं थीं. यह दुनिया और इसकी जद्दोजहद बड़े कमाल की है. आप उसी से दो-दो हाथ कर रहे होते हैं, जिसने आपको उंगली पकड़कर चलना सिखाया होता है. ऊषा खन्ना ने रॉबिन बनर्जी से गायन सीखा था और अब वो उनसे मुकाबिल हो रही थीं. तो दूसरी तरफ़ उनके म्यूजिक अरेंजर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल उनसे आगे निकल गए
पर उनका असली मुकाबला अभी होना बाकी था, पंचम जैसे धुरंधर बस छाने को ही थे और इसी आंधी में उनके कदम डगमगाए तो सही पर उन्होंने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी. इस दौर में भी ऊषा खन्ना ने अच्छे गाने कंपोज़ किये. मुकेश तो खैर उनके पसंदीदा गायक थे ही, पर उनके अलावा किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर से भी उन्होंने खूब गवाया. लता मंगेशकर के अलावा अब फ़िल्म इंडस्ट्री कुछ और गायकों को लाने की हिम्मत कर रही थी. इनमें एक नाम आता है सुमन कल्याणपुर का
बहुत से लोग दावा करते हैं कि अगर घेराबंदी न की गयी होती तो सुमन कल्याणपुर लता मंगेशकर की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी होतीं. उनके मुताबिक फ़िल्म इंडस्ट्री ने सुमन जी के साथ ही अन्याय नहीं किया, अपना भी नुकसान किया. जो भी है, यहां तक आते-आते लता जी के घोड़े की रास थोड़ी ढीली हुई तो हेमलता, अलका याग्निक और अनुराधा पौंडवाल जैसी गायिकाएं सामने आईं. पर सुमन कल्याणपुर और ऊषा खन्ना का साथ खूब चला. दोनों की जुगलबंदी ‘वो जिधर देख रहे हैं, हम उधर देख रहे हैं’ में नज़र आती है
ऊषा खन्ना ने प्रोडूसर-डायरेक्टर सावन कुमार से शादी की. सावन कुमार की पहली ही फ़िल्म ‘हवस’ (1974) का संगीत काफी हिट हुआ था. उसका एक गाना था ‘तेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद’ कई दिलजले आशिकों का आज भी सबसे पसंदीदा गीत है
इस दौर में भी जब गानों में से मेलोडी गायब होती जा रही थी, ऊषा जी उसका दामन थामे हुए चल रही थीं. ‘दादा’ (1978) का गाना ‘दिल के टुकड़े-टुकड़े मुस्कुरा के चल दिए ही देखिए. जैसा मधुर ऊषा जी का संगीत है वैसी ही मधुर आवाज़ येसुदास की है. इस फ़िल्म के संगीत ने उनके कदम दोबारा जमा दिए थे. उन्हें धड़ाधड़ कई फ़िल्में मिलीं. ‘साजन बिना सुहागन’, ‘भयानक’, ‘बिन फेरे हम तेरे’ फ़िल्मों का संगीत अच्छा चला. पर बात अब भी वही थी, बड़ी बैनर्स उन तक नहीं आ रहे थे.
1980 के आसपास उनकी शादी टूट गयी. विडंबना देखिये या मजबूरी, सावन कुमार ने ‘सौतन’ फ़िल्म का संगीत उन्हीं के ज़िम्मे किया. उन्होंने ने भी अच्छा संगीत दिया. उस फ़िल्म के लगभग सारे गाने हिट हुए थे.
इस दौर में अब ऊषा खन्ना पिछड़ती जा रही थीं. लोगों की पसंदें बदल गयी थीं. लफ़्ज़ों में गहराई नहीं बची थी, संगीत से मेलोडी तो लगभग ख़त्म ही गयी थी. ऊषा जी ने वापसी की भरपूर कोशिश की जो कामयाब नहीं हुई. बड़े बैनर्स नहीं थे, छोटे बजट की फ़िल्में अक्सर कम चलती और उनका संगीत उनसे से भी कम. धीरे-धीरे ऊषा खन्ना बिलकुल ही गायब हो गयीं. इसी समय उनके द्वारा विशाल भारद्वाज की धुन के इस्तेमाल को लेकर विवाद हुआ था.
एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनाएं
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दिल देके देखो (1959)
हम हिंदुस्तानी (1960)
फ्लैट नं. 9 (1961)
आओ प्यार करें (1964)
शबनम (1964)
निशान (1965)
मैं हूँ अलादीन (1965)
फ़ैसला (1965)
एक सपेरा एक लुटेरा (1965)
मैं वही हूँ (1966)
लाल बांग्ला (1966)
अलीबाबा और चालीस चोर (1966)
बादल (1966)
इंसाफ़ (1966)
दादा (1966)
खून का खून (1966)
दिलरुबा (1967)
चाँद पर चढ़े (1967)
रात अँधेरी थी (1967)
सरदार (1967)
आग (1967)
जोहर इन बॉम्बे (1967)
वो कोई और होगा (1967)
चाँद पर चढ़े (1967)
फ़रेब (1968)
एक रात (1968)
रूप रुपैया (1968)
एक फूल, एक भूल (1968)
मेरा नाम जोहार (1968)
हाय मेरा दिल (1968)
समय बड़ा बलवान (1969)
शिमला रोड (1969)
बंदिश (1969)
हम एक हैं (1969)
नतिजा (1969)
अनजान है कोई (1969)
मूडलमांजू (1970) (मलयालम)
इंसान और शैतान (1970)
बेगुनाह (1970)
कलकत्ता आफ्टर मिडनाइट (1970)
सस्ता खून महंगा प्यार (1970)
सौ साल बीत गए (1970)
कौन हो तुम (1970)
इल्ज़ाम (1970)
बहरूपिया (1971)
बहके कदम (1971)
शेर-ए-वतन (1971)
एक पहेली (1971)
क्रिमिनल्स, द (1971)
नाग पूजा (1971)
खोज (1971)
सर्कस में हत्या (1971)
मुनीमजी (1972)
बिजली (1972)
तन्हाई (1972)
सबक (1973)
हनीमून (1973)
अपराध (1974)
हवास (1974)
आ जा सनम (1975)
दो खिलाड़ी (1976)
मजदूर जिंदाबाद (1976)
लड़की भोली भली (1976)
गुमराह (1976)
अब क्या हुआ (1977)
अलीबाबा मर्जिना (1977)
साजन बिना सुहागन (1978)
सोने का दिल लोहे के हाथ (1978)
नागिन और सुहागिन (1979)
मेरी बीवी की शादी (1979)
बिन फेरे हम तेरे (1979)
दादा (1979)
भयानक (1979)
बेशाक (1980)
साजन की सहेली (1980)
आप तो ऐसे ना थे (1980)
बम्बई का महाराजा (1980)
करण (1981)
आदत से मजबूर (1981)
होटल (1981)
शमा (1981)
ताजुरबा (1981)
लड़ाकु (1981)
अबिचर (1981) (बंगाली)
सती और भगवान (1982)
पत्थर की लकीर (1982)
प्यारा दोस्त (1982)
लक्ष्मी (1982)
पांचवीं मंज़िल (1982)
अनोखा बंधन (1982)
वक्त के शहजादे (1982)
गोपीचंद जासूस (1982)
सौटेन (1983)
रास्ते और रिश्ते (1983)
बेखबर (1983)
अच्छा बुरा (1983)
दूर देश (1983)
जय बाबा अमरनाथ (1983)
स्वीकार किया मैंने (1983)
सरदार (1984)
लैला (1984)
कैप्टन बैरी (1984)
कुंवारी बहू (1984)
तलाक (1984)
रक्त बंधन (1984)
प्यासी आंखें (1984)
ज़माना (1985)
विशाल (1985)
यार कसम (1985)
पैसा ये पैसा (1985)
महक (1985)
मान मर्यादा (1985)
औरत (1986)
बडकार
धर्मम (1986; तमिल)
सस्ती दुल्हन महेंगा दूल्हा (1986)
जवानी की कहानी (1986)
प्रीति (1986)
बेसहारा (1987)
प्यार की जीत (1987)
कानून कानून है (1987)
डाकू हसीना (1987)
कौन जीता कौन हारा (1987)
सात बिजलीयाँ (1988)
मेरे बाद (1988)
ख़रीदार (1988)
पहली औरत पहला मर्द (1988)
औरत और पत्थर (1989)
लहू की आवाज़ (1989)
खुली खिड़की (1989)
नया खून (1990)
अमावस की रात (1990)
अनुराग (1990)
राजू दादा (1990)
कातिल जवानी (1990)
लोहे के हाथ (1990)
हालात (1990)
जान लड़ा देंगे (1990)
दीवाने (1991)
आग लगा दो सावन को (1991)
पक्का बदमाश (1991)
खूनी रात (1991)
रामवती (1991)
मेहँदी बन गई खून (1991)
बेवफा से वफा (1992)
कुमसिन हसीना (1992)
दिल अपना और प्रीत पराई (1993)
इंतकाम के शोले (1994)
पापी फरिश्ते (1995)
सनम हरजाई (1995)
घर बाज़ार (1998)
खोफनाक महल (1998)
मन्न, मोती ने काच (1999)
पुथुरामपुथरी उन्नियार्चा (2002) (मलयालम)
दिल परदेसी हो गया (2003)
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