महान शायर अमीर मीनाई (फोत)

मुंशी अमीर अहमद 'मीनाई' 🎂जन्म-21 फ़रवरी, 1829⚰️मृत्यु- 13 अक्टूबर, 1900
मुंशी अमीर अहमद 'मीनाई' 
तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा 

मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है

कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं 

नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है

दाग़ देहलवी के समकालीन अमीर मीनाई अपनी ग़ज़ल 'सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता' के लिए प्रसिद्ध हैं।अमीर मीनाई का नाम उर्दू अदब के मकबूल और बेहतरीन शायरों में शुमार किया जाता है।

🎂जन्म- 21 फ़रवरी, 1829
⚰️मृत्यु- 13 अक्टूबर, 1900
जन्म स्थान लखनऊ, उत्तर प्रदेश, भारत

हंस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी 
क्यूं तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी

आहों से सोज़-ए-इश्क़ मिटाया न जाएगा
फूंकों से ये चराग़ बुझाया न जाएगा
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अभी आए अभी जाते हो...
अभी आए अभी जाते हो जल्दी क्या है दम ले लो
न छोड़ूंगा मैं जैसी चाहे तुम मुझ से क़सम ले लो

किस ढिठाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'
वो मेरा घर है रहे जिसमें मोहब्बत मेरी
 
... तड़पते हैं हम 'अमीर'
ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है

तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किसका है
सीना किसका है मेरी जान जिगर किसका है
इस तरह सोए हैं सर रख के...
इस तरह सोए हैं सर रख के मेरे ज़ानू पर 
अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूं 

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता
इन हसीनों की जो तारीफ़ करो...
इन हसीनों की जो तारीफ़ करो चिढ़ते हैं 
सच तो ये है कि बुरा है उन्हें अच्छा कहना 

पहलू में मेरे दिल को न ऐ दर्द कर तलाश 
मुद्दत हुई ग़रीब वतन से निकल गया 
 इलाही क्या क़यामत है वो जब लेते हैं अंगड़ाई
मिरे ज़ख्मों के सब तांके अचानक टूट जाते हैं

उसकी हसरत है जिसे दिल से भी न सकूँ,
उसे चला हूँ जिस पा भी न सकूँ

हमारी हसरत है जिसे दिल से मिटा भी ना सकुन
ढोंढने हमें चला हूँ जिसे पा भी ना सकुन
🇮🇳रामपुर : रजा लाइब्रेरी के सभागार में अमीर मीनाई की साहित्यिक सेवायें विषय पर कार्यक्रम किया गया। इस अवसर पर राजस्थान विश्वविद्यालय व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं उर्दू विभाग के प्रोफेसर एस. फजले इमाम ने विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। इस अवसर पर रजा लाइब्रेरी द्वारा प्रकाशित राजभाषा पत्रिका (कबीर विशेषांक) का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. अनवारुल हसन कादरी द्वारा तिलावते कुरान एवं शहजादा गुलरेज की नाते-पाक से किया गया। इस अवसर पर सैयद नवेद कैसर ने अमीर मीनाई की एक प्रसिद्ध गजल प्रस्तुत की। उसके बाद प्रोफेसर एस. फजले इमाम ने अपने व्याख्यान में कहा कि अमीर मीनाई लखनऊ स्कूल के अच्छे शायर होने के साथ-साथ रामपुर के दबिस्तान का भी महत्वपूर्ण स्तंभ थे। उन्होंने उलेमा-ए-फरंगी महल से शिक्षा प्राप्त की थी। अरबी-फारसी का उनको अच्छा ज्ञान था। वाजिद अली शाह के दरबार के वह मशहूर शायर भी थे। 1857 के बाद वह रामपुर आये और 42 साल यहां पर काम किया। उन्होंने कहा कि उनका का साहित्यिक क्षेत्र में काफी ऊंचा स्थान है। उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब इंतखाब-ए-यादगार है। इसके अलावा दो दीवान सनम खान-ए- इश्क और दूसरा मिरातुल गैब है। एक दीवान गैरते बहारिस्तान 1857 के गदर में खत्म हो गया था। इसके अलावा एक नातिया मसनबी है। रजा लाइब्रेरी के निदेशक प्रोफेसर सैयद हसन अब्बास ने कहा कि जब दबिस्तान-ए-रामपुर की अदबी तारीख लिखी जाएगी, उसमें अमीर मीनाई का जिक्र जरूर होगा। उनके जिक्र के बगैर कोई तारीख मुकम्मल नहीं होगी। हम सब को इस बात पर गर्व करना चाहिए कि उनका संबंध दबिस्तान-ए-रामपुर से है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. हसन अहमद निजामी ने कहा कि वह शायर होने के साथ-साथ बहुत बड़े विद्वान भी थे। इसके अलावा वह अदबी शख्सियत और बहुत बड़े उर्दू के शब्दकोश लेखक भी थे। उनकी गिनती अपने दौर के अहम कसीदा निगारों में होती है।

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